Monday, December 2, 2019

सच में इक ख़लिश तो रह जाती होगी


ना जाने तुमको नींद कैसे आती होगी।
निर्लज्जों पर तो शर्म भी शर्माती होगी।।

आंखों पर पट्टी रख लेने से क्या होता है
छप्पन इंची छाती भी फट जाती होगी।।

आहों को अनसुना कर देने के बाद सही
तुममें भी इक बेचैनी घर कर जाती होगी।।

गूंगा कर देने की जिद से तय हो जाता है
बहरी अदालत खुद को अंधा पाती होगी।।

सदियों चीखों चीत्कारों का गला घोंट कर
फिर कैसे तुम्हें रास जिंदगी आती होगी।।

शरह-ए-हयात में ग़म-गुसार ही "पंकज"
सच में इक ख़लिश तो रह जाती होगी।।

©️ पंकज

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