Thursday, December 19, 2019

अब फैली फिज़ाओं में सियासी मतवाली है


लगता है देश में अब हर रोज दिवाली है।
कैसे पके आखिर खिचड़ी जो ख़याली है।।

गुमनाम सी रातों के भोरों में छिपे अंधियारे,
अफसोस आने वाली हर रात ही काली है।।

जलता हो नफरत से जब देश का हर कोना
लाज़िम तनी हुई हर इक आंख सवाली है।।

थक हार बैठ गई घुट घुट कर यह मानवता
मन बुझा बुझा सा दिल खाली खाली है।।

उन दिनों मौसम में बदहवासी सी थी छाई
अब फैली फिज़ाओं में सियासी मतवाली है।।

सच कुछ भी तो न बदला दिनन के फेरों में
देख हुआ अचरज सरकार बदलने वाली है।।

आग लगी तन मन में तो लड़ने भिड़ने से
किसने कह दिया दुनिया मर जाने वाली है।।

© पंकज

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