Thursday, December 19, 2019

अब फैली फिज़ाओं में सियासी मतवाली है


लगता है देश में अब हर रोज दिवाली है।
कैसे पके आखिर खिचड़ी जो ख़याली है।।

गुमनाम सी रातों के भोरों में छिपे अंधियारे,
अफसोस आने वाली हर रात ही काली है।।

जलता हो नफरत से जब देश का हर कोना
लाज़िम तनी हुई हर इक आंख सवाली है।।

थक हार बैठ गई घुट घुट कर यह मानवता
मन बुझा बुझा सा दिल खाली खाली है।।

उन दिनों मौसम में बदहवासी सी थी छाई
अब फैली फिज़ाओं में सियासी मतवाली है।।

सच कुछ भी तो न बदला दिनन के फेरों में
देख हुआ अचरज सरकार बदलने वाली है।।

आग लगी तन मन में तो लड़ने भिड़ने से
किसने कह दिया दुनिया मर जाने वाली है।।

© पंकज

Wednesday, December 18, 2019

लिखूं मोहब्बत कि सिर्फ तेरा नाम लिखूं

लिखूं मोहब्बत कि सिर्फ तेरा नाम लिखूं ?
उठे जब भी ख़लिश दिल-ए-पैगाम लिखूं।।

कशिश तड़प इंतजार सब्र न जाने क्या क्या
मेरे खुदा ! इनके लिए कौन सा कलाम लिखूं।।

ज़माने ने आहों फुगाँ को आखिर सुना कब है ?
यक दिल-ए-सदा के लिए कोई पयाम लिखूं।।

दे रही दस्तक तेरी आहटें सीने में मेरे जब से
जी करता है उन्हें झुक झुक के सलाम लिखूं।।

सवाल करती निगाहों को नज़रंदाज़ न करना
मौज-ए-बयार में जो डूबुं फिर राम राम लिखूं।।

© पंकज

Saturday, December 7, 2019

कैसी सदी हमारी है यह

दैन्य भाव से पूछ पूछ कर
करती रही करूण पुकार।
कैसी सदी हमारी है यह
सुन न सके कोई चीत्कार??

हां यह भी तो सच है कि
मुर्दों में न मचती हाहाकार।।
मार काट औ जलाकर उसको
कैसे होगी जय जयकार??

चंचल चितवन पावन जीवन
सूना आंगन है बिन अबला।।
रूला बिलखा कर जीवन में
सिद्ध कौन पुरूषार्थ भला??

© पंकज

Monday, December 2, 2019

सच में इक ख़लिश तो रह जाती होगी


ना जाने तुमको नींद कैसे आती होगी।
निर्लज्जों पर तो शर्म भी शर्माती होगी।।

आंखों पर पट्टी रख लेने से क्या होता है
छप्पन इंची छाती भी फट जाती होगी।।

आहों को अनसुना कर देने के बाद सही
तुममें भी इक बेचैनी घर कर जाती होगी।।

गूंगा कर देने की जिद से तय हो जाता है
बहरी अदालत खुद को अंधा पाती होगी।।

सदियों चीखों चीत्कारों का गला घोंट कर
फिर कैसे तुम्हें रास जिंदगी आती होगी।।

शरह-ए-हयात में ग़म-गुसार ही "पंकज"
सच में इक ख़लिश तो रह जाती होगी।।

©️ पंकज

Saturday, June 29, 2019

जिंदगी तो खुद ही नाजुक है “पंकज”

सियासत की गली में मोड़ बहुत हैं !
इस गन्ने में रस कम,पोर बहुत हैं !!

ऐ जिंदगी तू मुझे बेरुखी से ना देख,
संघर्ष भरे रण में यहाँ रणछोड़ बहुत हैं !!

सियासत तो कभी साफ सुथरी ना रही,
पर आजकल करनेवाले गठजोड़ बहुत हैं !!

गिरे बहुत ऊंचाई से हम तो पता चला,
हमको हमीं से जोड़नेवाले जोड़ बहुत हैं !!

 मुद्दा उठा तो आया नहीं सामने कोई
बटी खैरात तो मचानेवाले होड़ बहुत हैं !!

जिंदगी तो खुद ही नाजुक है “पंकज”,
फिर क्यों होते यहाँ तोड़ फोड़ बहुत हैं??

©️ पंकज

Friday, February 8, 2013

खुबसूरत तू भी है और तेरा एहसास भी


खुबसूरत तू भी है और तेरा एहसास भी

हर पल मुझे यूँ ही आती रहोगी रास भी

ख्यालों में मेरे कभी कभी आस पास भी

घुलती रहेगी मेरी सांसों में तेरी सास भी

Saturday, January 5, 2013

ज़माने की मुझे फिकर नहीं मेरे मौला


कभी कभी वो मेरे आसपास होता है

दिल भी अजीब है ये उदास होता है

पास हो तो परवाह नहीं तनिक भी 

पर दूर होकर ही कोई खास होता है

फलक पे आफ़ताब हो या हों तारें

हरेक पल उसी का एहसास होता है

ज़माने की मुझे फिकर नहीं मेरे मौला

मुर्शीद ही मेरा हरदम खास होता है

.........................................पंकज