राहगीरों को भी अपने रास्तों का पता नहीं होता !
इधर उधर किधर से जायेंगे ये भी पता नहीं होता !!
इशारों में बतानेवाला हर कोई रहबर नहीं यहाँ ,
और रहगुज़र को भी मंजिल का पता नहीं होता !!
... मस्ती के आलम में डूबे मस्तानो की न पूछ ,
उन्हे अपने उठे क़दमों का भी पता नहीं होता !!
निकल के चली नदी तो मुडके देखा नहीं कभी ,
खुद उसे रास्तों के मोड़ों का पता नहीं होता !!
चिंगारी को लगी हवा फिर कौन कहे उसकी
तब आग को अपने तपिश का पता नहीं होता !!
इक बार उड़ के तो देखो सपनो के परों से
आसमाँ को भी सरहदों का पता नहीं होता !!
सब कुछ सिमट के आ जाता है उसमे ही
पर औरत को खुद का ही पता नहीं होता !!
दीवानों से उनके बारे में पूछा नहीं करते “पंकज”
हवाओं को भी अपने रुख का पता नहीं होता !!
..................................................पंकज
इधर उधर किधर से जायेंगे ये भी पता नहीं होता !!
इशारों में बतानेवाला हर कोई रहबर नहीं यहाँ ,
और रहगुज़र को भी मंजिल का पता नहीं होता !!
... मस्ती के आलम में डूबे मस्तानो की न पूछ ,
उन्हे अपने उठे क़दमों का भी पता नहीं होता !!
निकल के चली नदी तो मुडके देखा नहीं कभी ,
खुद उसे रास्तों के मोड़ों का पता नहीं होता !!
चिंगारी को लगी हवा फिर कौन कहे उसकी
तब आग को अपने तपिश का पता नहीं होता !!
इक बार उड़ के तो देखो सपनो के परों से
आसमाँ को भी सरहदों का पता नहीं होता !!
सब कुछ सिमट के आ जाता है उसमे ही
पर औरत को खुद का ही पता नहीं होता !!
दीवानों से उनके बारे में पूछा नहीं करते “पंकज”
हवाओं को भी अपने रुख का पता नहीं होता !!
..................................................पंकज
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